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लालच और जीवन में अशांति (GREED AND DISTURBANCE IN LIFE)

"अगर मौसम के हिसाब से दरख्त के फल धीरे धीरे तोड कर खाओगे तो दरख्त सालों साल आपको फल देता रहेगा। मगर लालच में आ कर दरख्त को जड से ही काट दोगे तो तुम्हें फिर से आइंदा कभी भी फल खाने को नहीं मिलेंगें। ऊन देने वाली भेड की ऊन तरीके से थोडी थोडी काटते रहोगे तो भेड हर साल तुम्हें ऊन देती रहेगी। अगर लालच में आ कर सारी ऊन एक ही वक्त हासिल करने के लिए भेड की चमड़ी ही उतार दोगे तो भेड फौरन मर जाएगी। तुम्हें उससे आगे कभी भी ऊन नहीं मिलेगी। यही हाल इंसानों का भी है। अगर कोई इंसान तुम्हें धीरे धीरे थोडी थोडी मदद दे रहा है उसका एहसान मानो। लालच में आ कर अगर तुमने उस मददगार से एक ही झटके में सब कुछ छीन लिया तो तुम्हें आगे से कभी भी उस मददगार से मदद नहीं मिल पाएगी। मिलेगी कैसे? तुमने तो मदद करने की उसकी हैसियत काबिलियत ही छीन ली। इसका एक बड़ा नुकसान यह भी होगा कि तुम अशांत हो जाओगे।"

- डॉ स्वामी अप्रतिमनंदा जी

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